यीशु मसीह की परीक्षा  कहाँ, कैसे और किसके द्वारा हुआ The Temptation of Jesus 

यीशु मसीह की परीक्षा  कहाँ, कैसे और किसके द्वारा हुआ | The Temptation of Jesus
यीशु मसीह की परीक्षा 

यीशु मसीह के जीवन में जंगल की परीक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। यह केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि आत्मिक संघर्ष और विजय की गहरी शिक्षा है। यह घटना उस समय की है जब उन्होंने यरदन नदी में बपतिस्मा ग्रहण किया युहन्ना बप्तिस्मा दाता के द्वारा और उसके बाद पवित्र आत्मा की अगुवाई में जंगल की ओर गए। वहीं पर उनकी परीक्षा हुई। इस घटना का वर्णन मुख्यतः मत्ती रचित सुसमाचार 4:1–11, मार्क रचित सुसमाचार 1:12–13 और लूका रचित सुसमाचार 4:1–13 में मिलता है।

 परीक्षा का स्थान और समय

बपतिस्मा के तुरंत बाद आत्मा यीशु को जंगल में ले गई। यह स्थान निर्जन, सूखा और कठिन परिस्थितियों वाला था। वहाँ कोई भी सांसारिक सुविधा नहीं थी। वे चालीस दिन और चालीस रात उपवास करते रहे। यह समय केवल शारीरिक कष्ट का नहीं, बल्कि आत्मिक तैयारी का था।

चालीस संख्या बाइबल में विशेष महत्व रखती है-मूसा चालीस दिन तक पर्वत पर रहे, इस्राएली चालीस वर्ष जंगल में भटके। उसी प्रकार यीशु ने भी चालीस दिन का समय आत्मिक समर्पण में बिताया।

परीक्षा किसके द्वारा हुई?

यीशु की परीक्षा शैतान के द्वारा हुई। शैतान का अर्थ है “विरोध करने वाला” या “भटकाने वाला।” वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर करने का प्रयास करता है। उसने यीशु को भी उसी प्रकार आज़माया, जैसे पहले आदम और हव्वा को आज़माया था। परंतु यहाँ अंतर यह था कि जहाँ आदम असफल हुआ, वहीं यीशु विजयी हुए।

पहली परीक्षा: पत्थरों को रोटी बना दे

चालीस दिन के उपवास के बाद स्वाभाविक रूप से उन्हें भूख लगी। इसी क्षण शैतान ने कहा-यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इन पत्थरों को रोटी बनने की आज्ञा दे।

यह परीक्षा शारीरिक आवश्यकता से जुड़ी थी। भूख एक वास्तविक आवश्यकता है, परंतु शैतान चाहता था कि यीशु अपनी सामर्थ्य का उपयोग अपनी सुविधा के लिए करें।

यीशु ने उत्तर दिया- लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु परमेश्वर के मुख से निकलने वाले हर वचन से जीवित रहेगा।

इस उत्तर में गहरा संदेश है। मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भोजन नहीं, बल्कि परमेश्वर का वचन है। यीशु ने दिखाया कि आत्मिक सत्य शारीरिक भूख से अधिक महत्वपूर्ण है।

दूसरी परीक्षा: मंदिर के कंगूरे पर खड़ा किया

इसके बाद शैतान उन्हें पवित्र नगर में ले गया और मंदिर की चोटी पर खड़ा किया। उसने कहा-यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो नीचे कूद पड़, क्योंकि लिखा है कि स्वर्गदूत तेरी रक्षा करेंगे।

यहाँ शैतान ने स्वयं पवित्र शास्त्र का उपयोग किया। उसका उद्देश्य था कि यीशु परमेश्वर की परीक्षा लें और चमत्कार के द्वारा लोगों को प्रभावित करें।

यीशु ने उत्तर दिया- यह भी लिखा है तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।

यह परीक्षा अहंकार और दिखावे की थी। सच्चा विश्वास कभी भी परमेश्वर को परखने का प्रयास नहीं करता।

तीसरी परीक्षा: संसार के राज्य और वैभव दिखाना

अंत में शैतान उन्हें एक ऊँचे पर्वत पर ले गया और संसार के सब राज्य और उनका वैभव दिखाया। उसने कहा-यदि तू झुककर(गिरकर) मुझे प्रणाम करे, तो यह सब मैं तुझे दे दूँगा।

यह परीक्षा सत्ता, वैभव और लालच की थी। यीशु संसार के उद्धार के लिए आए थे, परंतु शैतान उन्हें आसान मार्ग दिखा रहा था-बिना क्रूस के राज्य प्राप्त करने का मार्ग।

यीशु ने दृढ़ता से कहा-हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है,कि तु प्रभु अपने परमेश्वर को दण्डवत कर और केवल उसी की उपासना कर।

यह उत्तर स्पष्ट करता है कि आराधना केवल परमेश्वर के लिए है। किसी भी प्रकार की सफलता यदि परमेश्वर से दूर करती है, तो वह सच्ची नहीं है।

परीक्षा की समाप्ति और विजय

तीनों परीक्षाओं में यीशु ने परमेश्वर के वचन से उत्तर दिया। उन्होंने कोई चमत्कार नहीं किया, कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि शास्त्र का सहारा लिया।
जब शैतान असफल हुआ, तब वह कुछ समय के लिए हट गया और स्वर्गदूत आकर यीशु की सेवा करने लगे।
यह घटना दिखाती है कि परीक्षा स्थायी नहीं होती। यदि मनुष्य विश्वास में स्थिर रहे, तो अंत में विजय निश्चित है।

आत्मिक अर्थ और आज के लिए शिक्षा

1. परीक्षा जीवन का भाग है – यहाँ तक कि परमेश्वर का पुत्र भी परीक्षा से गुजरा।
2. वचन सबसे बड़ा हथियार है – हर परीक्षा में यीशु ने शास्त्र से उत्तर दिया।
3. लालच, अहंकार और शारीरिक इच्छाएँ – यही तीन प्रमुख क्षेत्र हैं जहाँ मनुष्य गिरता है।
4. धैर्य और आज्ञाकारिता – कठिन परिस्थितियों में भी परमेश्वर की इच्छा को मानना ही सच्ची विजय है।

यीशु की यह विजय उनके सार्वजनिक सेवकाई की शुरुआत थी। जंगल की परीक्षा ने उन्हें आत्मिक रूप से और अधिक दृढ़ बनाया।

निष्कर्ष

जंगल की परीक्षा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि विश्वासियों के लिए मार्गदर्शन है। यह सिखाती है कि कठिन समय में भी परमेश्वर का वचन थामे रहना चाहिए। भूख, लालच, और दिखावे के बीच भी यदि मन स्थिर रहे, तो विजय निश्चित है।

यीशु ने यह सिद्ध किया कि सच्ची शक्ति आत्मसंयम और आज्ञाकारिता में है। उन्होंने संसार को यह दिखाया कि परमेश्वर पर पूर्ण भरोसा ही हर परीक्षा में जीत दिलाता है।

यदि हम भी अपने जीवन की परीक्षाओं में उनके समान धैर्य, विश्वास और वचन पर आधारित उत्तर दें, तो हम भी आत्मिक विजय का अनुभव कर सकते हैं। तो मेरे साथियों आज आज के लिए इतना ही बाकि अगला पोस्ट में | क्या आप संगीत का दीवाना हैं तो नीचे गीतों के बोल का लिंक दिया गया है आप उसे भी देख सकते हैं|

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