यीशु मसीह के कार्य और उनकी सेवकाई

यीशु मसीह के कार्य और उनकी सेवकाई | Jesus Christ Work And ministry 2026


हेल्लो मेरे प्यारे साथियों यीशु सहाय जय येशु और जय मसीह तो आइये हमलोग जानते हैं यीशु मसीह के कार्य और उनके सेवकाई के बारे में  |

प्रभु यीशु ख्रीस्ट का जीवन और सेवकाई मानव इतिहास की सबसे प्रभावशाली घटनाओं में से एक है। उनका जन्म बैतलहम में हुआ, वे नासरत में पले-बढ़े और लगभग 30 वर्ष की आयु में उन्होंने सेवकाई शुरू की। उनका मुख्य उद्देश्य था-परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाना, लोगों को पाप से छुटकारा दिलाना और प्रेम, क्षमा तथा उद्धार का मार्ग दिखाना, यही उनका मुख्य उदेश्य था । 

 परमेश्वर के राज्य का प्रचार

 परमेश्वर का राज्य ही यीशु की सेवकाई का केंद्र बिंदु था। वे नगर-नगर और गाँव-गाँव जाकर शिक्षा देते थे कि परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है। उन्होंने लोगों को पश्चाताप करने और सुसमाचार पर विश्वास करने और मन फिराने का वचन प्रचार करता था (मत्ती 4:17,मार्क 1:14-15,लूका 4:43 )।

उनकी शिक्षा साधारण शब्दों में होती थी, परंतु गहरी आत्मिक सच्चाइयों से भरी होती थी। वे दृष्टांतों (Fable) के द्वारा समझाते थे,जैसे:- बीज बोने वाले का दृष्टांत (मत्ती 13:3-9), खोई हुई भेड़ का (लूका 15:4-7), उड़ाऊ पुत्र का  (लूका 15:11-32) आदि। इन शिक्षाओं में प्रेम, दया, नम्रता और क्षमा का संदेश था।

  चंगाई और चमत्कार 

यीशु ने अपनी सेवकाई के दौरान अनेक चमत्कार किए।
  •  पानी को दाखरास बनाया (युहन्ना 2:1-11)
  •  अंधों को दृष्टि दी (यूहन्ना 9:1-7)
  •  लंगड़ों को चलाया (मरकुस 2:1-12)
  •  कोढ़ियों को शुद्ध किया (मत्ती 8:2-3)
  •  मृतकों को जिलाया (मरकुस 5:41-42,यूहन्ना 11:43-44)
  •   पतरस की सास को किया चंगा (मत्ती 8:14-15)
  •  तूफान को शांत किया (मरकुस 4:39)
  •  पाँच रोटियों और दो मछलियों से हजारों को भोजन कराया (मत्ती 14:19-21)

इन चमत्कारों का उद्देश्य केवल आश्चर्य दिखाना नहीं था, बल्कि यह सिद्ध करना था कि वे परमेश्वर के पुत्र हैं और उनमें दिव्य सामर्थ्य है। वे करुणा से भरकर लोगों की पीड़ा दूर करते थे। उनकी चंगाई केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक भी थी।

 पापियों से प्रेम और क्षमा 

यीशु की सबसे बड़ी शिक्षा प्रेम थी। उन्होंने कहा-“अपने शत्रुओं से प्रेम रखो” और “जो तुमसे बैर रखते हैं उनके लिए प्रार्थना करो।” यह शिक्षा उस समय के समाज के लिए बहुत अनोखी थी।

उन्होंने पापियों, कर-वसूलने वालों, और समाज से तिरस्कृत लोगों के साथ बैठकर भोजन किया। उन्होंने दिखाया कि परमेश्वर का प्रेम सबके लिए है। व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री को पत्थर मारने से बचाकर उन्होंने कहा—“जो निष्पाप हो वही पहला पत्थर मारे।” यह उनके दया और क्षमा के स्वभाव को दर्शाता है। यीशु कहता है मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढ़ने और उनका उद्धार करने आता है। (यूहन्ना 8:3-11, लूका 19:1-10, लूका 19:10

  शिष्यों का चुनाव

यीशु ने 12 शिष्यों को चुना और उन्हें अपने साथ रखा। उन्होंने उन्हें शिक्षा दी, चमत्कार करने की सामर्थ्य दी और प्रचार के लिए भेजा। यह उनकी सेवकाई का महत्वपूर्ण भाग था—आने वाली पीढ़ियों के लिए सेवकों को तैयार करना।

उन्होंने उन्हें सिखाया कि सच्चा नेतृत्व सेवा में है-“जो बड़ा होना चाहता है, वह सेवक बने।” यह सिद्धांत आज भी मसीही सेवकाई का आधार है। (लूका 6:12-16, मत्ती 10:1-8)

 यीशु की पहाड़ी उपदेश 

यीशु का पहाड़ी उपदेश उनकी महान शिक्षाओं में से एक है। यीशु ने पहाड़ पर बैठकर लोगों को आत्मिक जीवन की शिक्षा दी।

 धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं,क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है (मत्ती 5:3) |
 धन्य हैं वे, जो दयावन्त हैं,क्योंकि उन पर दाया की जाएगी (मत्ती 5:7)|
 धन्य हैं वे, जो मेल कराने वाले हैं,क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलायेंगे ((मत्ती 5:9)|

उन्होंने सिखाया कि केवल बाहरी धर्म पर्याप्त नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता आवश्यक है। उन्होंने प्रार्थना का आदर्श रूप “हे हमारे पिता” भी सिखाया। (मत्ती 5:3-12,5:13,14. 5:44,  6:9-13)

 अंतिम भोज और बलिदान

अपनी सेवकाई के अंत में यीशु ने अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज किया। उन्होंने रोटी और दाखरस देकर कहा कि यह उनका शरीर और लहू है, जो बहुतों के लिए बहाया जाएगा।

इसके बाद उन्हें पकड़वाया गया, झूठे आरोप लगाए गए और अंत में क्रूस पर चढ़ाया गया। क्रूस पर उन्होंने मानव जाति के पापों का भार उठाया। फिर यीशु ने कहा-हे पिता इन्हें क्षमा कर दे क्योंकि ये लोग नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।

उनका बलिदान प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने स्वयं को बलिदान कर दिया ताकि मनुष्य उद्धार पा सके।
(मत्ती 26:47-50 लूका 22:19-20, 23:33, 23:34 इत्यादि )

 पुनरुत्थान और महान आज्ञा

तीसरे दिन यीशु मृतकों में से जी उठे। यह घटना मसीही विश्वास का आधार है। पुनरुत्थान ने सिद्ध किया कि मृत्यु पर उनकी विजय है।
पुनरुत्थान के बाद उन्होंने शिष्यों को महान आज्ञा दी—“जाओ, सब जातियों को चेला बनाओ।” यह आज भी कलीसिया की सेवकाई का मूल आदेश है।
(मत्ती 28:5-6, लूका 24:6-7, यूहन्ना 20:1-18, मत्ती 28:19-20)इत्यादि|

 निष्कर्ष

यीशु की सेवकाई केवल तीन वर्षों की थी, पर उसका प्रभाव अनंतकाल तक है। उन्होंने प्रेम, दया, क्षमा और सच्चाई का मार्ग दिखाया। उनके कार्यों ने संसार को बदल दिया।

उनकी सेवकाई हमें सिखाती है:

 नम्र बनो, दूसरों की सेवा करो,क्षमा करो,सच्चाई के मार्ग में चलो और परमेश्वर पर विश्वास रखो

प्रभु यीशु का जीवन केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज भी जीवित संदेश है। जो उनके मार्ग पर चलता है, वह जीवन, शांति और अनन्त आशा को पाता है। 

और देखें :